आँख खुली तो...

आँख खुली तो...

रात में घर था, भाई-बहना, बाबूजी थे माई थी ।
आँख खुली तो मैं तनहा था, आँख मेरी भर आई थी ।।

नींद में ही घर घूम के आया, सबको डांटा और हंसाया,
जोर-जोर से गाना गया, लड़ा, पिटा और उधम मचाया,
आँख खुली तो मैं चुप था, और बस ख़ामोशी छाई थी ।
आँख खुली तो मैं तनहा था, आँख मेरी भर आई थी ।।


अक्सर सुबह में भाई को जबरन दुकान पर ले जाना,
पैसे की बिन फिकर किये, भर पेट पकौड़े खा जाना,
आँख खुली तो फिर शुरू हुई, चिंता पाई-पाई की ।
आँख खुली तो मैं तनहा था, आँख मेरी भर आई थी ।।


कोई पड़े बीमार तो, "कोई बात नहीं" यह दिखलाना,
पर देख दवाई-सूई लगता, मन ही मन में डर जाना,
आँख खुली तो बदन ताप रहा, पास न दवा, न माई थी ।
आँख खुली तो मैं तनहा था, आँख मेरी भर आई थी ।।

दुखते सर पर हाथ न कोई, पलक भीग गयी, बात यूँ खली,
करवट बदला, घुटने मोड़ा, सिकुड़ा, और फिर आँख मूँद ली,
लिए आस की फिर सब होंगे, आँख अगर लग जाएगी ।
आँख खुली तो मैं तनहा था, आँख मेरी भर आई थी ।।