चल उठ पथिक

चल उठ पथिक

चल उठ पथिक अब नव शिखर पर...
राज कर...
आग़ाज कर.
अब तोड़ बंधन मुक्त हो...
परवाज कर आग़ाज कर.
देख कैसे छिप रहा है बादलों के बीच वो
जो न दिखे!
तो सोच!
तू ढूँढता किस चीज को?
जो दूर था... क्या अब नहीं?
जो पास है... था तब कहीं?
जो न दिखा... क्या न मिला?
जो दिख गया... मिल ही गया?
न सोच आंसू बन के बरसेंगे कभी बादल सभी
जो था छुपा वो दिख पड़े और आ मिले मंजिल तेरी
जोश भर, हिम्मत को धर
चल हो खड़ा, संघर्ष कर
आ गिरेगा 'धम्म' से जो है अड़ा आकाश पर
गिर-गिर संभल, अब हो निडर खुद हौसलों पर नाज़ कर
चल उठ पथिक अब नव शिखर पर...
राज कर...
आग़ाज कर.
अब तोड़ बंधन मुक्त हो...
परवाज कर आग़ाज कर.
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